Ardh Satya

There’s an utterly captivating poem that gets recited in Ardh Satya. I think the poem has the same title as the movie, and is by this guy named Deepak Chitre. I watched the movie once a long time ago and loved it, but it was that poem that became my shortcut to reliving the experience.

I’d been searching for it for a long time, and found it recently here. The rendition by the blogger Neha Viswanathan is decent. Not Om Puri, as she says, but worth a listen. Using Blogger’s new transliteration tool, I’ve keyed it in here:

चक्रव्युह में घुसने से पहले
कौन था मैं और कैसा था
यह मुझे याद ही ना रहेगा ।

चक्रव्यूह में घुसने के बाद
मेरे और चक्रव्यूह के बीच
सिर्फ एक जानलेवा निकटथा थी
इसका मुझे पता ही ना चलेगा ।

चक्रव्यूह से निकलने के बाद
मैं मुक्त हो जाऊं भले ही
फिर भी चक्रव्यूह कि रचना में
फर्क ही ना पड़ेगा ।

मरूं या मारूं
मारा जाऊं या जान से मार दूं
इसका फैसला कभी ना हो पायेगा ।

सोया हुआ आदमी जब
नींद से उठकर चलना शुरू कर्ता है
तब सपनों का संसार उसे
दोबारा दिख ही ना पायेगा ।

उस रौशनी में जो निर्णय कि रौशनी है
सब कुछ समान हो जाएगा क्या ?

एक पल्दे में नपुंसकता
एक पल्दे में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्ध सत्य ।

Neha, whoever and wherever you are, thank you from the bottom of my heart.

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2 thoughts on “Ardh Satya

  1. Jitendra Chaudhary says:

    हिन्दी ब्लॉगिंग मे आपका स्वागत है। आप अपना ब्लॉग नारद पर रजिस्टर करवाएं। नारद पर आपको हिन्दी चिट्ठों की पूरी जानकारी मिलेगी। किसी भी प्रकार की समस्या आने पर हम आपसे सिर्फ़ एक इमेल की दूरी पर है।

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